विष्णुपुराण के अनुसार रावण विष्णु भगवान का द्वारपाल था।एक श्राप के कारण रावण को असुर बनना पड़ा और वो भी एक बार नहीं तीन बार राक्षस योनि में जन्म लिया है रावण ने।
एक बार की बात है सनत,सनातन और सनक सनंदन कुमार चार ऋषिगण विष्णु जी से मिलने पहुंचे तो उन्हें विष्णु जी के दो द्वारपालक
जय और विजय जी पहरा दे रहे थे उन्होंने उन ऋषिगणों को अंदर जाने से रोक लिया और उन्हें अंदर नहीं जाने दिया।ऋषिगणों के बहुत निवेदन करने पर भी उन्होंने उन्हे अंदर नहीं जाने दिया तो ऋषिगणों ने उन्हे राक्षस बनने का श्राप दे दिया यह सुनकर वह दोनों बहुत घबरा गर और चिंतित हो उठे उन्होंने ऋषिगणों से श्रमा मांगी पर वह नहीं माने उन दोनों ने विष्णु जी को ये समस्या बताई विष्णु जी ने ऋषिगणों को श्राप वापस लेने को बोला परन्तु ऋषिगण बोले कि अब वह कुछ नहीं कर सकते परन्तु इसका एक उपाय है इन दोनों को तीन जन्मों तक राक्षस योनि जन्म लेना पड़ेगा और इनकी मृत्यु भगवान विष्णु के हाथो ही हो तभी इनका उद्धार संभव है ये इनके पुराने रूप में लोट आएंगे।
वह तीन जन्म कोन - कोन से रावण के?
पहले जन्म में तो ये दोनों द्वारपाल हिरण्याक्ष और हिरण्यकस्यपू के रूप में जन्म लिया उन दोनों का मृत्यु का कारण विष्णु भगवान है बने और दूसरे जन्म में रावण और कुंभकरण के रूप में जन्म लिया तब इनकी मृत्यु का कारण भी विष्णु भगवान बने जिन्होंने श्री राम के रूप में जन्म लिया और इन दोनों की मृत्यु का कारण बने। तीसरे जन्म में ये शिशुपाल और दंतव्रक के रूप में जन्म लिया जिसका उद्धार करने के लिए भगवान विष्णु को कृष्ण के रूप में जन्म लेना पड़ और इनका उद्धार किया।




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